भारत का ‘मी टू’ क्षण: शक्ति विभेदक और लिंग निष्पक्षता संबंध पर प्रभाव - TIR News - The India Review


 

भारत का ‘मी टू’ क्षण: शक्ति विभेदक और लिंग निष्पक्षता संबंध पर प्रभाव

October 10, 2018

कामकाजी महिलाओं के साथ कार्यस्थलों और पब्लिक सेटिंग्स में हुए उत्पीड़न के उनके अनुभवों की कहानियों की प्रविष्टि के कारण कुछ दिनो से भारतीय मीडिया गूंज रहा है। बॉलीवुड उद्योग के बड़े नामों, पत्रकारों, राजनेताओं जैसे हस्तियों पर यौन अपराधों के साथ बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के आरोप लगे है। उल्लेखनीय व्यक्तित्व जैसे नाना पाटेकर, आलोक नाथ, एमजे अकबर आदि को महिला सहयोगियों के प्रति अपने आचरण को समझाना मुश्किल लग रहा है।

२००८ में हुई एक फिल्म की शूटिंग के दौरान नाना पाटेकर पर उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने इसकी शुरुआत की। ट्विटर हैशटैग #मीटूइंडिया होने से कई कामकाजी महिलाओं ने अधिक मात्रा मे आरोप लगाये। जाहिर है, सोशल मीडिया ने एक महान संबल के रूप में उन महिलाओं को योग्य बनाया जो अब दुनिया के किसी भी हिस्से से लोगों के साथ बातचीत करने में और अपनी आवाज उठाने में सक्षम हुई हैं। कुछ लोग तर्क देते हैं कि मी टू जैसे आंदोलनो की आवश्यकता प्राचीन काल से ही रही है।

मी टू आंदोलन कुछ समय पहले ही २००६ मे अमेरिका में ताराना बर्क द्वारा स्थापित किया गया था। उनका इरादा उन लोगो की मदद करना था जो यौन हिंसा से उत्पीड़ित थे। कम आय वाले परिवार की महिलाओं पर ध्यान देने के साथ, बर्क ने ” सहानुभूति के माध्यम से सशक्तिकरण ” का लक्ष्य रखा । वह उत्पीड़ित लोगो को ये बताना चाहती थी कि वे अपने आप को अकेले महसूस ना करे । तब से इस आंदोलन ने एक लंबा सफर तय किया है। अब एक बहुत बड़ा उत्पीड़ितों का का समुदाय दुनिया के सभी हिस्सों से और जीवन के सभी क्षेत्रों से आंदोलन में सबसे आगे आ रहा है। वे वास्तव में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पीड़ितों के जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव ला रहे हैं।

भारत में, मी टु मूवमेंट एक साल पहले अक्टूबर २०१‍७ में # मीटूइंडिया (ट्विटर पर हैश टैग के रूप में) शुरू हुआ था जहां पीड़ितों या उत्पीड़ितों ने घटनाओं का वर्णन किया और कार्यस्थलों और अन्य समान सेटिंग्स के सत्ता समीकरणों में से दरिंदगो का पर्दाफाश किया है। संक्षेप समय मे इसे ‘यौन उत्पीड़न’ से मुक्त समाज की ओर एक आंदोलन छेड़ दिया गया है।

इसके जवाब में, कई महीने पहले, मशहूर फिल्म व्यक्तित्व सरोज खान ने एक विवादास्पद बयान दिया था, “एक महिला जो चाहती है उस पर निर्भर करता है, अगर वह पीड़ित नहीं बनना चाहती तो वह कभी पीड़ित नहीं होगी। यदि आपमें कला है, तो आप खुद को क्यों बेचेंगे? फिल्म उद्योग को दोष न दें, यह हमें हमारी आजीविका प्रदान करता है”। शायद वह ‘लेन देन’ के रूप में पेशेवर लाभ के लिए सहमति से संबंध का जिक्र कर रही थी। भले ही सहमति हो, नैतिक रूप से यह सही नहीं हो सकता है।

सोशल मीडिया में आरोपों के सिलसिले और कहानियां जिस प्रकार उभर रहे हैं इससे यहीं जाहीर होता है कि इन घटनाओं में सहमति असंभव थीं। महिलाओं द्वारा अस्वीकार करने की स्थिति में जाहिर है इसमें कोई सहमति नहीं है और देखा जाए तो ऐसी घटनाएं गंभीर अपराध हैं जिसे राज्य की कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा निपटाया जाना चाहिए । औपचारिक कार्य स्थान में सत्ता समीकरण में स्पष्ट सहमति का समन्वय कैसे बैठायी जा सकती है, संभवतः चर्चा का मुद्दा हो सकता है।

ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए भारत का एक बहुत ही मजबूत कानूनी ढांचा है। यहां तक ​​कि अधीनस्थ व्यक्ति के साथ सहमति यौन संबंध भी गैरकानूनी माना गया है। संवैधानिक प्रावधानों के रूप में सुरक्षात्मक तंत्र, श्रेष्ठ अदालतों के कानून, संसदीय कानून, कई राष्ट्रीय और राज्य सांविधिक कमीशन पुलिस में विशेष कोर अब तक कार्यस्थल पर महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों की रोकथाम में और न्याय दिलवाने में बहुत प्रभावी नहीं रहे हैं।

शायद मौजूदा पुरुष-प्रधान सामाजिक स्वभाव के कारण पुरुषों को सही मूल्यों समझाने में शिक्षा और प्राथमिक सामाजिककरण की असफलता भी एक कारण हो सकती है। जाहिर है कि कुछ पुरुष महिलाओं द्वारा ‘नहीं’ को स्वीकार करने में असामर्थ्य है यहाँ तक की सत्ता समीकरणों में भी । शायद ‘सहमति’ की समझ और उसकी प्रशंसा की कमी है। शायद इन पुरुषो को कामुकता की अभिव्यक्ति को कार्य स्थलों के बाहर समझना चाहिए।

मी टु आंदोलन भारत में निश्चित रूप से कार्य स्थलों में यौन दरिंदगो को ‘बेनकाब ’ करने में मदद कर रहा है। इसने पीड़ितों को लांछन से वर्जित किया है और उन्हें उपचार के मार्ग प्रदान करने में योगदान दिया है । हालांकि इस आंदोलन को शहरी महिलाओं से परे है विस्तार करने की आवश्यकता है। मीडिया सनसनीखेज के बावजूद इसमें लिंग समानता में योगदान करने की क्षमता है। संक्षेप में, यह निश्चित रूप से संभावित शिकारियों के बीच कुछ डर पैदा करेगा और प्रतिरोध के रूप में कार्य करेगा। डर के कारण अनुपालन आदर्श बात नहीं हो सकती है, लेकिन संभवतः दूसरी सबसे अच्छी संभावना है।

लेखक: उमेश प्रसाद
लेखक लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के पूर्व छात्र हैं और ब्रिटेन स्थित पूर्व अकादमिक हैं ।
इस वेबसाइट पर व्यक्त विचार और राय पूरी तरह से लेखक और अन्य योगदानकर्ताओं के हैं, यदि कोई हो।




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