गिरता भारतीय रुपया (आईएनआर): क्या हस्तक्षेप लंबी अवधि में मदद कर सकता है ? - TIR News - The India Review


 

गिरता भारतीय रुपया (आईएनआर): क्या हस्तक्षेप लंबी अवधि में मदद कर सकता है ?

September 15, 2018

“भारतीय रुपया अब तक के सबसे निम्न स्तर पर पहुँच गया है। इस लेख में लेखक ने रुपये की गिरावट के पीछे कारणों का विश्लेषण किया है और नियामकों द्वारा उनकी प्रभावशीलता के लिए किए गए हस्तक्षेप और उपायों का मूल्यांकन किया है।

भारतीय अर्थव्यवस्था ने हाल ही में २०१८- १‍९ की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में ८.२% की वृद्धि दर्ज की है. हालांकि, विडंबनात्मक रूप से देखा जाए तो भारतीय रुपया (आईएनआर) कमजोर है और हाल ही के इतिहास में सबसे कम कीमत पर ७३ रुपये के साथ (अमरीकी डालर के मुकाबले) इस साल की शुरुआत से ही रुपये के मूल्य में लगभग १३% की कमी आई है। और यह दावा किया जा रहा है कि इस समय भारतीय रुपया एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन कर रहा है।

मुद्रा के मूल्य को निर्धारित करने वाले विशेष रूप से यूएसडी या जीबीपी के मुकाबले चर क्या हैं? आईएनआर मे आयी गिरावट के लिए जिम्मेदार कारक क्या हैं? यानी कि जाहिर है कि भुगतान की शेष राशि (बीओपी) की स्थिति महत्वपूर्ण भूमिका अदा करताi है। आप अपने आयात पर कितनी विदेशी मुद्रा खर्च करते हैं और आप निर्यात से कितनी कमाई करते हैं। आयात के लिए मुख्य रूप से डॉलर की आपूर्ति से मिलने वाले आयात के भुगतान करने के लिए डॉलर की मांग है। घरेलू बाजार में डॉलर की मांग और आपूर्ति डॉलर के मुकाबले रुपए के मूल्य को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

तो, वास्तव में चल क्या रहा है? ऊर्जा की जरूरतों के लिए, भारत पेट्रोलियम पर काफी निर्भर है। आर्थिक विकास को बनाये रखना महत्वपूर्ण है विशेष रूप से औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों में. भारत की आवश्यकताओ का लगभग ८०% पेट्रोलियम आयात की जाति है। तेल की कीमत की प्रवृत्ति ऊपर की ओर है। इसका असल प्रभाव उच्च आयात बिल है अतः तेल आयात के भुगतान करने के लिए डॉलर की मांग में वृद्धि हुई है।

चिंता का दूसरा क्षेत्र एफडीआई है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के मुताबिक २०१८- १‍९ में १.६ अरब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुई जबकि २०१७-१‍९ में १९.६ बिलियन डॉलर हुआ था क्योंकि विदेशी निवेशकों ने विकसित अर्थव्यवस्थाओं के ब्याज दरो में बढ़ोतरी की वजह से भारतीय बाजार से अपना पैसा वापस ले लिया। इसने विदेशी निवेशकों द्वारा प्रेषण के लिए डॉलर की मांग में और वृद्धि की है। इसके अलावा, भारत दुनिया का सबसे बड़े शस्र के आयातक होने के नाते ज्यादा रक्षा खरीद बिल का भुगतान करता हैं।

भारतीय बाजार में डॉलर की आपूर्ति मुख्य रूप से निर्यात विदेशी निवेश और प्रेषण के माध्यम से होती है। दुर्भाग्यवश, यह मांग के साथ तालमेल रखने में नाकाम रही है इसलिए मांग और आपूर्ति की कमी महंगा डॉलर और सस्ता रुपया के लिए प्रमुख कारण है।

तो, डॉलर में मांग और आपूर्ति के अंतर को सही करने के लिए क्या किया गया है? रिजर्व बैंक ने अंतर को कम करने के लिए डॉलर बेचकर और बाजार से रुपए खरीदकर हस्तक्षेप किया है । पिछले चार महीनों में आरबीआई ने बाजार में करीब २५ अरब डॉलर का निवेश किया है। यह एक अल्पकालिक उपाय है और अब तक प्रभावी नहीं रहा है क्योंकि रुपया अभी भी गिरावट में है।

१‍४ सितंबर २०१८ को, सरकार ने नियम को शिथिल करके उत्पादकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपया बांड के मुद्दे और विदेशी फंड को उठाने के लिए डॉलर के अंतर्वाह को बढ़ाने और बहिर्वाह को कम करके पांच उपायों की घोषणा की जो मुख्य रूप से भारत में विदेशी निवेश को आकर्षित करने से संबंधित है। क्या यह भारत में डॉलर के अंतर्वाह की वृद्धि में मददगार होगा? मुश्किल दिखता है क्योंकि विदेशी निवेशकों ने विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कम ब्याज दरों का लाभ उठाया है भारतीय और अन्य उभरते बाजारों में पैसा निवेश किया है विशेष रूप से ऋणी बाजार में। अब ओईसीडी देशों में ब्याज दरें ऊपर की तरफ बढ़ रही हैं, इसलिए उन्होंने अपने भारतीय पोर्टफोलियो का महत्वपूर्ण हिस्सा वापस ले लिया और हाथ खींच लिये है।

दीर्घकालिक उपाय क्या क्या हो सकते है जैसे कि तेल के आयात पर निर्भरता को कम करके, निर्यात को बढ़ाके , अस्त्र शस्त्र और रक्षा उपकरणों पर आत्मनिर्भर होके इत्यादि ?

आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए तेल बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन निजी वाहनों द्वारा विशिष्ट खपत का क्या? वाहन योग्य सड़कों पर प्रति किलोमीटर चलती निजी कारों की संख्या विशेष रूप से बड़े शहरों में बहुत अधिक है। राजधानी दिल्ली में वाहनों की संख्या में अनियंत्रित वृद्धि की वजह से इसकी छाप दुनिया में सबसे खराब प्रदूषित शहर की बन गयी है। शहरों में एक नीति लागू कर मोटर वाहनों की संख्या को कम करने के उद्देश्य और पहल लोगों के स्वास्थ्य के मामले में जनहित के लिए अच्छा साबित हो सकता है जैसे – “लंदन के भीड़ भाड़ वाले इलाके में गाड़ियों के प्रवेश पर जुर्माना और वाहनों की संख्या को सीमित पंजीकृत करना। दिल्ली द्वारा प्रयोग मे लायी गयी “सम विषम” की इस नीति की पहल के अलोकप्रिय होने का कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति में कमी है।

उत्पादनो का निर्यात और बढ़ावा मदद कर सकता है। “मेक इन इंडिया” अभी तक कोई छाप छोड़ता हुआ प्रतीत नहीं होता है। जाहिर है, कि नोट बंदी और जीएसटी के कार्यान्वयन का उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। कमजोर रुपया निर्यात में मदद नहीं कर रहा है। भारत रक्षा उपकरणों के आयात पर भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करता है। यह ध्यान देने योग्य है कि भारत ने विशेष रूप से अंतरिक्ष और परमाणु प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की क्षमता बनाने में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है, फिर भी यह स्वदेशी अपनी रक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने में अशक्त है।

भारत की मुद्रा संकटों की बहिर्वाह को कम करने और डॉलर के प्रवाह में वृद्धि के लिए दीर्घकालिक प्रभावी उपायों की आवश्यकता है ।




Comments

LEAVE A REPLY

हाल की पोस्ट

बिहार को जरूरत है युवा उधमियो का समर्थन करने के लिये एक मज़बूत प्रणाली की

December 17, 2018

गुरु नानक की शिक्षाओं की भारत के आर्थिक विकास के लिए प्रासंगिकता

November 23, 2018

जीवन के विरोधाभासी आयामों की अन्योन्यक्रिया पर प्रतिबिंब

November 22, 2018

दिल्ली में वायु प्रदूषण: एक हल करने योग्य चुनौती

November 12, 2018

कैसे एक मुगल युवराज असहिष्णुता के शिकार बन गए

November 2, 2018

प्रवासी भारतीय दिवस (पीबीडी) २०१‍९ वाराणसी में २१- २३ जनवरी को आयोजित किया जा रहा है

October 31, 2018

प्रवासी भारतीयों के लिए सूचना का अधिकार (आरटीआई): सरकार एनआरआई को आवेदन दर्ज करने की अनुमति देती है|

October 29, 2018

सबरीमाला मंदिर: क्या मासिक धर्म के दौरान महिलाएं ब्रह्मचर्य देवताओं के लिए कोई खतरा है?

2018-10-20

नवजोत सिंह सिद्धू: एक आशावादी या संकुचित उप राष्ट्रवादी?

October 15, 2018

भारत का ‘मी टू’ क्षण: शक्ति विभेदक और लिंग निष्पक्षता संबंध पर प्रभाव

October 10, 2018