गौतम बुद्ध की ” बहुमूल्य” मूर्ति भारत को वापस सौंपी गयी - TIR News - The India Review


 

गौतम बुद्ध की ” बहुमूल्य” मूर्ति भारत को वापस सौंपी गयी

August 31, 2018

१‍२वीं शताब्दी के बुद्ध की प्रतिमा जो पांच दशक पहले भारत में एक संग्रहालय से चुरा ली गई थी भारत को वापस सौंप दी गयी है

यह कला की दुनिया में एक रोचक कहानी है ‘वापसी’ की । १‍२वीं शताब्दी की बुद्ध प्रतिमा को हाल ही में ब्रिटेन द्वारा भारत लौटाया गया था जब इसे यूनाइटेड किंगडम के व्यापार मेला मे लिंडा अल्बर्टसन (कला के खिलाफ अपराध में अनुसंधान के लिए एसोसिएशन की सदस्य (एआरसीए)) और विजय कुमार (इंडिया प्राइड प्रोजेक्ट से) द्वारा देखा और पहचाना गया था। उनकी इस सूचना के बाद ब्रिटिश पुलिस ने इस प्रतिमा को लंदन में भारतीय उच्चायोग को सौंप दिया।

चांदी की सजावट के साथ कांस्य से बनी यह बुद्ध प्रतिमा भारत के पुरातात्विक सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा मान्यता प्राप्त थी।एएसआई सरकार एक स्वामित्व वाली संस्था है जो देश में ऐतिहासिक स्मारकों के पुरातात्विक अनुसंधान और संरक्षण के लिए जिम्मेदार है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने कहा कि यह मूर्ति उत्तरी भारत में बिहार के नालंदा में एक संग्रहालय से १‍९६१ में चोरी हुई थी। लंदन में बिक्री के लिए जाने से पहले इस प्रतिमा का कई हस्तो में आदान प्रदान हुआ। यूके पुलिस ने बताया कि बुद्ध प्रतिमा के विभिन्न डीलरों और मालिकों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि यह प्रतिमा भारत से चोरी हो गयी थी और इसलिए उन्होंने जांच में और प्रतिमा की वापसी के लिए पुलिस की कला और प्राचीन वस्तु इकाई के साथ सही ढंग से सहयोग किया।

लगभग ५७ साल पहले, भारत में बिहार के नालंदा से लगभग १६ बहुमूल्य कांस्य प्रतिमाएं गायब हो गई थीं। इनमें से प्रत्येक प्रतिमा पर कला का उत्कृष्ट काम था। इस विशेष प्रतिमा में दर्शाया गया है की परमात्मा बुद्ध भुमिसपर मुद्रा (धरती से छूने वाला इशारा) में बैठे हुए है और इस प्रतिमा की लंबाई ५:३०हैं।

इंडिया प्राइड प्रोजेक्ट के विजय कुमार इस खोयी हुई प्रतिमा पर जांच कर रहे थे। वह मुख्य रूप से चेन्नई से है हालांकि वर्तमान में वह सिंगापुर में एक महाप्रबंधक के रूप में काम करते है। जब खोयी हुई वस्तु की जांच चल रही थी तब विजय कुमार ने एएसआई के पूर्व महानिदेशक सच्चिंद्र एस विश्वास के साथ कई बातचीत की थी। उस समय कुमार के पास सबूत नहीं थे। कुमार का कहना है कि पश्चिमी देशों के अधिकांश संग्रहालयों को चोरी हुई प्राचीन वस्तुओं के फोटोग्राफिक सबूत की आवश्यकता होती है, जबकि एएसआई फोटोग्राफिक रिकॉर्ड रखने में बहुत अच्छा नहीं था। सौभाग्य से विश्वास ने १‍९६१ और १‍९६२ में विस्तृत विवरणों के साथ कुछ मूर्तियों की तस्वीरें रखी थीं। इन विवरणों के आधार पर कुमार ने अंतरराष्ट्रीय कला बाजार में चोरी हुई १६ वस्तुओं पर नजर रखने का फैसला किया।

संयोगवश कुछ साल पहले लिंडा अल्बर्टसन (एआरसीए) और कुमार ने कुछ परियोजनाओं पर एक साथ कार्य किया था और एक-दूसरे से अच्छी तरह से परिचित थे। इसलिए, जब अल्बर्टसन ने यूरोपीय फाइन आर्ट्स मेले में जाने की अपनी यात्रा के बारे में बताया, तो कुमार उनके साथ गए। मेले में कुमार को पता चला कि मूर्ति को १‍२वीं शताब्दी की बजाय ७ वीं शताब्दी के रूप में गलत तरीके से सूचीबद्ध किया गया है। इसके बाद उन्होंने बिस्वास द्वारा प्रदान की गई तस्वीरों की तुलना की और निष्कर्ष निकाला कि यह बुद्ध प्रतिमा ही है हालांकि इस पर कुछ परिवर्तन और मरम्मत की गई थी।

अलबर्टसन ने कला के दिग्गजों और नीदरलैंड के प्राचीन विभाग तथा राष्ट्रीय पुलिस सेना के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय इंटरपोल को साक्ष्य का समर्थन करने के लिए संपर्क किया और दूसरी तरफ कुमार ने भारत के भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (एएसआई) विभाग को सतर्क कर दिया। हालांकि, प्रासंगिक अधिकारियों को मनाने के लिए उन दोनों को कुछ दिन लग गए और एक चिंता यह थी कि यूरोपीय फाइन आर्ट्स मेला समाप्त हो रहा था। बुद्ध प्रतिमा की बिक्री को रोकने के लिए डच पुलिस ने व्यापार मेले के समापन दिवस पर डीलर से संपर्क किया। डीलर ने पुलिस को सूचित किया कि कंपनी माल पर प्रतिमा को बेच रही थी, उसका वर्तमान मालिक नीदरलैंड में नहीं था और डीलर ने मूर्ति को वापस लंदन ले जाने की योजना बनाई अगर प्रतिमा की बिक्री नहीं हुई।

जब मूर्ति को लंदन वापस ले जाया जा रहा था, अलबर्टसन और कुमार ने महत्वपूर्ण और आवश्यक दस्तावेजों को न्यू स्कॉटलैंड यार्ड की कला और प्राचीन वस्तु इकाई की कॉन्स्टेबल सोफी हेस के सामने पारित किया। इस बीच भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग की वर्तमान महानिदेशक उषा शर्मा ने लंदन में भारतीय उच्चायोग को स्थिति के बारे में जानकारी देने के लिए एक पत्र लिखा। डीलर ने प्रतिमा की उचित शिनाख़्त के लिए कहा और जिसके लिए भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग ने कई दस्तावेजों को दिखाया जो इस प्रतिमा और तस्वीरों के बीच समानता के बिंदु से मेल खाते थे। डीलर अभी भी इस बात पर अटल था कि लगभग १० अंक ऐसे थे जहां प्रतिमा भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के रिकॉर्ड से मेल नहीं खा रही थी।

उचित परिश्रम के लिए कॉन्स्टेबल हेस ने अंतर्राष्ट्रीय परिषद संग्रहालयों (आईसीओएम) से संपर्क किया उन्होंने मूर्ति का अध्ययन करने के लिए एक तटस्थ विशेषज्ञ की व्यवस्था की। आईसीओएम (ICOM) द्वारा कुमार और अल्बर्टसन के दावों को मान्य करने वाली रिपोर्ट आने से पहले इस विशेषज्ञ ने प्रतिमा की सावधानी से जांच करने के लिए कुछ महीने का वक्त लिया। कांस्य मोम साँचा या ” पिघला हुआ मोम ” प्रक्रिया द्वारा बनाया गया था। इसका मतलब यह है कि इस प्रतिमा को स्टैंड अलोन कलाकृति बनाने के लिए मोम के नमूने का केवल एक ही बार इस्तेमाल किया गया था। एक बार जब यह प्रतिमा स्थापित हो गयी तब यह प्रेक्षण किया गया वैसा ही क्षतिग्रस्त स्थान इस मूर्ति में है जैसा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के रिपोर्ट में उल्लेख किया गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का विवरण मे जो पीतल के जले हुए निशान उस प्रतिमा पर थे उनकी रिपोर्ट से सहमति जता रहे थे।

समानता के अन्य बिंदुओं के अलावा क्लिचर बुद्ध का असमान रूप से बड़ा दाहिना हाथ था जो पृथ्वी को छू रहा था जिसने इस मूर्ति को एक बहुत ही अद्वितीय कलाकृति बना दिया । इस प्रकार मालिक और डीलर को प्रतिमा देने के लिए कहा गया और वे इसे वापस सौंपने के लिए सहमत हुए। यह विशेष मामला कानून प्रवर्तन, विद्वानों और व्यापारियों के आपसी सहयोग तथा भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच सांस्कृतिक कूटनीति का एक अच्छा उदाहरण है। अधिकांश श्रेय कुमार और अल्बर्टसन को उनकी कर्मठता के लिए जाता है कि इतने वर्षों के बाद भी खोयी हुयी प्रतिमा को पहचाना और पुनः प्राप्त कर लिया।

एक बार भारत द्वारा मूर्ति प्राप्त होने के बाद, यह निश्चित रूप से नालंदा संग्रहालय में रखी जायेगी । नालंदा का बौद्ध धर्म के साथ एक विशेष ऐतिहासिक संबंध है। यह वह जगह भी है जहां दुनिया का सबसे पुराना विश्वविद्यालय – नालंदा विश्वविद्यालय – वह स्थान है जहां 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में विद्वानों और बौद्धिकों का मिश्रण हुआ था। इस जगह में बुद्ध ने सार्वजनिक वार्ता और उपदेश भी दिए। भारत से मूल्यवान कलाकृतियों और पत्थरों को सदियों तक लूटा गया और अब वे तस्करी चैनलों के माध्यम से इधर उधर यात्रा कर रहे हैं। यह आशावादी और रोमांचक समाचार है और इसमें शामिल सभी लोग जिन्होंने इस सफल खोज और वापसी को सक्षम किया है। वे सभी भारतीय विरासत के इस महत्वपूर्ण प्रतिमा की वापसी को सुविधा प्रदान करने में सक्षम होने से प्रसन्न हैं।




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